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Thursday, March 12, 2015

Yogmudra for HEART ATTACK, ANGINA PECTORIS, PAIN KILLER, SORBITATE, ANGINA PECTORIS, NERVOUSNESS, MIGRAINE.


                                                 मृत संजीवनी या अपान वायु मुद्रा 

विधि :-- तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे की गद्दी में लगाएं (वायु मुद्रा) तथा मध्यमा और अनामिका के अग्रभाग अंगूठे के अग्रभाग से मिलाएं (अपान मुद्रा)| सबसे छोटी अंगुली सीधी रखें |


अभिप्राय :-- इस मुद्रा में दो मुद्राएं एक साथ लगाई जाती हैं – वायु मुद्रा और अपान मुद्रा | इसीलिये इसका यौगिक नाम है – अपान वायु मुद्रा | यह हृदयाघात (HEARTATTACK) में अत्यंत लाभकारी होने के कारण इसे मृतसंजीवनी मुद्रा की संज्ञा भी दी गई है | यदि अपान वायु मुद्रा ही कहें तो इस मुद्रा की विधि स्मरण करना आसान हो जाता है – वायु मुद्रा , अपान मुद्रा |

वायु मुद्रा पीड़ानाशक है – स्वाभाविक PAIN KILLER , शरीर में कहीं भी पीड़ा हो , गैस की समस्या हो , वायु मुद्रा उसे ठीक करती है | अपान मुद्रा पाचन शक्ति एवं हृदय को मजबूत करती है | ANGINA PECTORIS हृदय की पीड़ा के लिए तो यह शक्तिशाली मुद्रा है |

लाभ :-- (1) अपान वायु मुद्रा का हृदय पर विशेष प्रभाव पड़ता है | हृदयाघात (HEARTATTACK) रोकने एवं हृदयाघात हो जाने पर भी यह मुद्रा तत्काल लाभ पहुंचाती है | यह मुद्रा सोरबीटेट (SORBITATE) की गोली का कार्य करती है – दो तीन सैकेंड के भीतर ही इस मुद्रा का लाभ आरम्भ हो जाता है , रोगी को चमत्कारिक राहत मिलती है | बढ़े हुई वायु के कारण ही हृदय की रक्तवाहिनियां शुष्क होने लगती है – उनमें सिकुड़न पैदा होने लगती हैं | वायु मुद्रा से हृदय की नालिकाओं का सिकुड़न दूर होता है |

(2) हृदय शूल (ANGINA PECTORIS) दूर होता है |

(3) हृदय के सभी रोग दूर होते हैं |

(4) उच्च रक्तचाप और निम्न रक्तचाप दोनों ही ठीक होते हैं |

(5) दिल की धड़कन बढ़ जाए या धीमी हो जाए – दोनों ही स्थितियों में दिल की धड़कन सामान्य करती है |

(6) घबराहट (NERVOUSNESS) हो , स्नायु तन्त्र के सभी रोगों में लाभकारी |

(7) फेफड़ों को स्वस्थ बनाती है – अस्थमा में लाभकारी है |

(8) वातरोगों में तुरन्त लाभ – पेट की वायु , गैस , पेट दर्द गुदा रोग , एसिडिटी , गैस से हृदय की जलन सभी ठीक होते हैं |

(9) सिर दर्द , आधे सिर का दर्द (MIGRAINE) , सिर दर्द वास्तव में पेट की खराबी से ही होता है | सिर दर्द में इस मुद्रा का चमत्कारी लाभ होता है | अनिद्रा अथवा अधिक परिश्रम से होने वाले रोग भी ठीक होते हैं |

(10) घुटने के दर्द में आराम – सीढियां चढ़ने से पहले 5 से 7 मिनट अपान वायु मुद्रा लगाने से सीढियां चढ़ते हुए न सांस फूलेगा न ही घुटनों में दर्द होगा |

(11) हिचकी आनी बन्द हो जाती है | दांत दर्द में भी लाभदायक |

(12) आंखों का अकारण झपकना भी रुकता है | हमारी संस्कृति में स्त्रियों की दायीं आंख व पुरुषों की बायीं आंख का फड़कना अशुभ माना जाता है | अपानवायु मुद्रा से इसमें लाभ मिलता है |

(13) वात – पित्त – कफ तीनों दोषों को दूर करती है | रक्तसंचार प्रणाली , पाचन प्रणाली सभी को ठीक करती है |

(14) शरीर एवं मन के सभी नकारात्मक दबाव दूर करती है | इस मुद्रा के लगातार अभ्यास से सभी प्रकार के हृदय रोग दूर होते हैं परन्तु मुद्रा के साथ अपने भोजन , दिनचर्या , व्यायाम आदि पर ध्यान देना भी आवश्यक है | हृदय रोग में यह मुद्रा रामवाण है | एक प्रभावशाली इंजेक्शन से भी अधिक लाभदायक है |


सावधानी :-- * इस मुद्रा को दिन में दो बार 15 – 15 मिनट तक ही लगाएं |

• तर्जनी (Index finger) को अंगुष्ठ के मूल में लगाकर मध्यमा (Middle finger) तथा अनामिका (Ring finger) को अंगुष्ठ के अग्र भाग से मिलाकर यह मुद्रा बनती है | यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण और चमत्कारी मुद्रा है | जितनी जल्दी इस मुद्रा का शरीर पर प्रभाव होता है , शायद ही किसी दूसरी मुद्रा का होता होगा |

Monday, March 9, 2015

Meaning of Low Density lipoprotive, cholesterol, Very Low Density lipoprotive, BP.


Please Read Carefully

ये जानना बहुत जरुरी है ...
हम पानी क्यों ना पीये खाना खाने के बाद। 
क्या कारण है |

हमने दाल खाई,
हमने सब्जी खाई, 
हमने रोटी खाई,
हमने दही खायी 
लस्सी पी ,
दूध,दही छाझ लस्सी फल आदि|,

ये सब कुछ भोजन के रूप मे हमने ग्रहण किया 

ये सब कुछ हमको उर्जा देता है और पेट उस उर्जा को आगे ट्रांसफर करता है | पेट मे एक छोटा सा स्थान होता है जिसको हम हिंदी मे कहते है "अमाशय" उसी स्थान का संस्कृत नाम है "जठर"| उसी स्थान को अंग्रेजी मे कहते है " epigastrium "| ये एक थेली की तरह होता है और यह जठर हमारे शरीर मे सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि सारा खाना सबसे पहले इसी मे आता है। ये बहुत छोटा सा स्थान हैं 


इसमें अधिक से अधिक 350GMS खाना आ सकता है | हम कुछ भी खाते सब ये अमाशय मे आ जाता है| आमाशय मे अग्नि प्रदीप्त होती है उसी को कहते हे"जठराग्न"। |ये जठराग्नि है वो अमाशय मे प्रदीप्त होने वाली आग है । ऐसे ही पेट मे होता है जेसे ही आपने खाना खाया की जठराग्नि प्रदीप्त हो गयी | यह ऑटोमेटिक है,जेसे ही अपने रोटी का पहला टुकड़ा मुँह मे डाला की इधर जठराग्नि प्रदीप्त हो गई|  ये अग्नि तब तक जलती हे जब तक खाना पचता है | अब अपने खाते ही गटागट पानी पी लिया और खूब ठंडा पानी पी लिया| और कई लोग तो बोतल पे बोतल पी जाते है | अब जो आग (जठराग्नि) जल रही थी वो बुझ गयी| आग अगर बुझ गयी तो खाने की पचने की जो क्रिया है वो रुक गयी|

अब हमेशा याद रखें खाना जाने पर हमारे पेट में दो ही क्रिया होती है,
एक क्रिया है जिसको हम कहते हे "Digestion"  और दूसरी है "fermentation"
फर्मेंटेशन का मतलब है सडना 
और डायजेशन का मतलब हे पचना|

आयुर्वेद के हिसाब से आग जलेगी तो खाना पचेगा,खाना पचेगा तो उससे रस बनेगा|

जो रस बनेगा तो उसी रस से मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र और अस्थि बनेगा और सबसे अंत मे मेद बनेगा| ये तभी होगा जब खाना पचेगा| यह सब हमें चाहिए| ये तो हुई खाना पचने की बात अब जब खाना सड़ेगा तब क्या होगा..?

खाने के सड़ने पर सबसे पहला जहर जो बनता है वो हे यूरिक एसिड (uric acid ) |कई बार आप डॉक्टर के पास जाकर कहते है की मुझे घुटने मे दर्द हो रहा है, मुझे कंधे-कमर मे दर्द हो रहा है तो डॉक्टर कहेगा आपका यूरिक एसिड बढ़ रहा है आप ये दवा खाओ, वो दवा खाओ यूरिक एसिड कम करो| और एक दूसरा उदाहरण खाना जब सड़ता है, तो यूरिक एसिड जेसा ही एक दूसरा विष बनता है जिसको हम कहते हे LDL (Low Density lipoprotive) माने खराब कोलेस्ट्रोल (cholesterol )| जब आप ब्लड प्रेशर(BP) चेक कराने डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो आपको कहता है (HIGH BP ) हाई-बीपी है आप पूछोगे कारण बताओ? तो वो कहेगा कोलेस्ट्रोल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है | आप ज्यादा पूछोगे की कोलेस्ट्रोल कौनसा बहुत है ? तो वो आपको कहेगा LDL बहुत है |इससे भी ज्यादा खतरनाक एक  विष हे वो है VLDL (Very Low Density lipoprotive)| ये भी कोलेस्ट्रॉल जेसा ही विष है। अगर VLDL बहुत बढ़ गया तो आपको भगवान भी नहीं बचा सकता| खाना सड़ने पर और जो जहर बनते है उसमे एक ओर विष है जिसको अंग्रेजी मे हम कहते है triglycerides| जब भी डॉक्टर आपको कहे की आपका "triglycerides" बढ़ा हुआ हे तो समज लीजिए की आपके शरीर मे विष निर्माण हो रहा है | तो कोई यूरिक एसिड के नाम से कहे,कोई कोलेस्ट्रोल के नाम से कहे, कोई LDL -VLDL के नाम से कहे समझ लीजिए की ये विष हे और ऐसे विष 103 है | ये सभी विष तब बनते है जब खाना सड़ता है |

मतलब समझ लीजिए किसी का कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे ध्यान आना चाहिए की खाना पच नहीं रहा है , कोई कहता हे मेरा triglycerides बहुत बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे डायग्नोसिस कर लीजिए आप ! की आपका खाना पच नहीं रहा है | कोई कहता है मेरा यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट लगना चाहिए समझने मे की खाना पच नहीं रहा है | क्योंकि खाना पचने पर इनमे से कोई भी जहर नहीं बनता| खाना पचने पर जो बनता है वो है मांस,मज्जा,रक्त ,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र,अस्थि और खाना नहीं पचने पर बनता है यूरिक एसिड, कोलेस्ट्रोल,LDL-VLDL| 

और यही आपके शरीर को रोगों का घर बनाते है !

पेट मे बनने वाला यही जहर जब ज्यादा बढ़कर खून मे आते है ! तो खून दिल की नाड़ियो मे से निकल नहीं पाता और रोज थोड़ा थोड़ा कचरा जो खून मे आया है इकट्ठा होता रहता है और एक दिन नाड़ी को ब्लॉक कर देता है *जिसे आप heart attack कहते हैं ! तो हमें जिंदगी मे ध्यान इस बात पर देना है की जो हम खा रहे हे वो शरीर मे ठीक से पचना चाहिए और खाना ठीक से पचना चाहिए इसके लिए पेट मे ठीक से आग (जठराग्नि) प्रदीप्त होनी ही चाहिए| क्योंकि बिना आग के खाना पचता नहीं हे और खाना पकता भी नहीं है

* महत्व की बात खाने को खाना नहीं खाने को पचाना है | आपने क्या खाया कितना खाया वो महत्व नहीं हे। खाना अच्छे से पचे इसके लिए वाग्भट्ट जी ने सूत्र दिया !!

"भोजनान्ते विषं वारी"
(मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है )🔸

* इसलिए खाने के तुरंत बाद पानी कभी मत पिये!
अब आपके मन मे सवाल आएगा कितनी देर तक नहीं पीना ???
तो 1 घंटे 48 मिनट तक नहीं पीना !
अब आप कहेंगे इसका क्या calculation हैं ??
बात ऐसी है ! जब हम खाना खाते हैं तो जठराग्नि द्वारा सब एक दूसरे मे मिक्स होता है और फिर खाना पेस्ट मे बदलता हैं ! पेस्ट मे बदलने की क्रिया होने तक 1 घंटा 48 मिनट का समय लगता है ! उसके बाद जठराग्नि कम हो जाती है ! (बुझती तो नहीं लेकिन बहुत धीमी हो जाती है ) पेस्ट बनने के बाद शरीर मे रस बनने की परिक्रिया शुरू होती है ! तब हमारे शरीर को पानी की जरूरत होती हैं । तब आप जितना इच्छा हो उतना पानी पिये !! जो बहुत मेहनती लोग है (खेत मे हल चलाने वाले ,रिक्शा खीचने वाले पत्थर तोड़ने वाले) उनको 1 घंटे के बाद ही रस बनने लगता है उनको  घंटे बाद पानी पीना चाहिए !

अब आप कहेंगे खाना खाने के पहले कितने मिनट तक पानी पी सकते हैं ???
तो खाना खाने के 45 मिनट पहले तक आप पानी पी सकते हैं !
अब आप पूछेंगे ये मिनट का calculation ????
बात ऐसी ही जब हम पानी पीते हैं तो वो शरीर के प्रत्येक अंग तक जाता है ! और अगर बच जाये तो 45 मिनट बाद मूत्र पिंड तक पहुंचता है ! तो पानी - पीने से मूत्र पिंड तक आने का समय 45 मिनट का है ! तो आप खाना खाने से 45 मिनट पहले ही पाने पिये !
इसका जरूर पालन करे ! अधिक अधिक लोगो को बताएं



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Saturday, February 28, 2015

अमेरिका में एक लीटर गंगाजल 250 डालर में क्यों मिलता है।

गंगा जल खराब क्यों नहीं होता?
अमेरिका में एक लीटर गंगाजल 250 डालर में क्यों मिलता है।
प्रस्तुति: फरहाना ताज

सर्दी के मौसम में कई बार छोटी बेटी को खांसी की शिकायत हुई और कई प्रकार के सिरप से ठीक ही नहीं हुई। इसी दौरान एक दिन घर ज्येष्ठ जी का आना हुआ और वे गोमुख से गंगाजल की एक कैन भरकर लाए। थोड़े पोंगे पंडित टाइप हैं, तो बोले जब डाक्टर से खांसी ठीक नहीं होती तो तब गंगाजल पिलाना चाहिए।

मैंने बेटी से कहलवाया, ताउ जी को कहो कि गंगाजल तो मरते हुए व्यक्ति के मुंह में डाला जाता है, हमने तो ऐसा सुना है तो बोले, नहीं कई रोगों का भी इलाज है। बेटी को पता नहीं क्या पढाया वह जिद करने लगी कि गंगा जल ही पिउंगी, सो दिन में उसे तीन बार दो-दो चम्मच गंगाजल पिला दिया और तीन दिन में उसकी खांसी ठीक हो गई। यह हमारा अनुभव है, हम इसे गंगाजल का चमत्कार नहीं मानते, उसके औषधीय गुणों का प्रमाण मानते हैं।

कई इतिहासकार बताते हैं कि सम्राट अकबर स्वयं तो गंगा जल का सेवन करते ही थे, मेहमानों को भी गंगा जल पिलाते थे।

इतिहासकार लिखते हैं कि अंग्रेज जब कलकत्ता से वापस इंग्लैंड जाते थे, तो पीने के लिए जहाज में गंगा का पानी ले जाते थे, क्योंकि वह सड़ता नहीं था। इसके विपरीत अंग्रेज जो पानी अपने देश से लाते थे वह रास्ते में ही सड़ जाता था।

करीब सवा सौ साल पहले आगरा में तैनात ब्रिटिश डाक्टर एमई हॉकिन ने वैज्ञानिक परीक्षण से सिद्ध किया था कि हैजे का बैक्टीरिया गंगा के पानी में डालने पर कुछ ही देर में मर गया।

दिलचस्प ये है कि इस समय भी वैज्ञानिक पाते हैं कि गंगा में बैक्टीरिया को मारने की क्षमता है। लखनऊ के नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट एनबीआरआई के निदेशक डॉक्टर चंद्र शेखर नौटियाल ने एक अनुसंधान में प्रमाणित किया है कि गंगा के पानी में बीमारी पैदा करने वाले ई कोलाई बैक्टीरिया को मारने की क्षमता बरकरार है। डॉ नौटियाल का इस विषय में कहना है कि गंगा जल में यह शक्ति गंगोत्री और हिमालय से आती है। गंगा जब हिमालय से आती है तो कई तरह की मिट्टी, कई तरह के खनिज, कई तरह की जड़ी बूटियों से मिलती मिलाती है। कुल मिलाकर कुछ ऐसा मिश्रण बनता जिसे हम अभी नहीं समझ पाए हैं।

डॉक्टर नौटियाल ने परीक्षण के लिए तीन तरह का गंगा जल लिया था। उन्होंने तीनों तरह के गंगा जल में ई-कोलाई बैक्टीरिया डाला। नौटियाल ने पाया कि ताजे गंगा पानी में बैक्टीरिया तीन दिन जीवित रहा, आठ दिन पुराने पानी में एक एक हफ्ते और सोलह साल पुराने पानी में 15 दिन। यानी तीनों तरह के गंगा जल में ई कोलाई बैक्टीरिया जीवित नहीं रह पाया।

वैज्ञानिक कहते हैं कि गंगा के पानी में बैक्टीरिया को खाने वाले बैक्टीरियोफाज वायरस होते हैं। ये वायरस बैक्टीरिया की तादाद बढ़ते ही सक्रिय होते हैं और बैक्टीरिया को मारने के बाद फिर छिप जाते हैं।
मगर सबसे महत्वपूर्ण सवाल इस बात की पहचान करना है कि गंगा के पानी में रोगाणुओं को मारने की यह अद्भुत क्षमता कहाँ से आती है?

दूसरी ओर एक लंबे अरसे से गंगा पर शोध करने वाले आईआईटी रुड़की में पर्यावरण विज्ञान के रिटायर्ड प्रोफेसर देवेंद्र स्वरुप भार्गव का कहना है कि गंगा को साफ रखने वाला यह तत्व गंगा की तलहटी में ही सब जगह मौजूद है। डाक्टर भार्गव कहते हैं कि गंगा के पानी में वातावरण से आक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता है। भार्गव का कहना है कि दूसरी नदियों के मुकाबले गंगा में सड़ने वाली गंदगी को हजम करने की क्षमता 15 से 20 गुना ज्यादा है।